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एक पागल सी लड़की

एक पागल सी लड़की
पागलों की तरह तुम्हें चाहती है

तुम्हारी बात मैं अपनी
पूरी दुनिया दे जाती है
डर क्या है, पता नहीं
पर तुम्हें कुछ होते ही काँप जाती है
रोता जिसे किसी ने न देख
तुम्हारी गोद में बच्चों की तरह सिसक जाती है
तुम्हें देखती ही वो
ख़ुशी से उछलने लग जाती है
तुम्हें जाते देख
नासमझ सी मुंह फुला बैठ जाती है

एक पागल सी लड़की
पागलों की तरह तुम्हें चाहती है

सब के सामने वो जो भी हो
तुम्हारे सामने ने वो खुद को दिखा पाती है
सच या झूठ
अपने सारे पन्ने खोल जाती है

कभी दोस्त, कभी बीवी,
कभी मां, बन जाती है
खुद कभी खाया नहीं
पर तुम्हें अपने हाथों से खिलाती है
जब तुम सोते हो
तुम्हें देख के मुस्कराती है
जब तुम हस्ते हो
दिन भर खिलखिलाती है

एक पागल सी लड़की
पागलों की तरह तुम्हें चाहती है

ऐसा तो कुछ करना हो तो
सालों सोचने में लगती है
पर लिए कुछ करते समय
ज़रा भी नहीं हिचकिचाती है
खुद की बात पे कुछ ना भी बोले
पर तुम्हारे लिए दुनिया से लड़ जाती है
उसकी नज़रे तुम्हारे चेहरे के अलावा
और कुछ भी न देख पाती है
वो अपने नाम के बाद
तुम्हारा नाम लिखना चाहती है

एक पागल सी लड़की
पागलों की तरह तुम्हें चाहती है

तुम्हारी तारीफ़ करने में
वो झरा भी न थकती है
तुम्हारा ही नाम ले
जब सुबह वो जगती है
अपनी फिक्र नहीं उसे
बस तुम्हारे फिक्र करती है
तुमसे मिलने के लिए
सब से झूठ बोलकर आती है
वैसे शौक नहीं उसे
डांट सब से खाने का
पर तुम्हारी चाहत में
उसे वो भी भांति है

एक पागल सी लड़की
पागलों की तरह तुम्हें चाहती है

©मेहमान कवयित्री – विशाखा सिंह[अपना घरौंदा]

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मेहमान लेखक/लेखिका वो है जो 'अपना घरौंदा'पर कभी कभार लिखते हैं।

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