FEATUREDPoetryRevolutionary Poem

समाज के अंग

बड़ी दूर है,उन्नाव
बड़ी दूर है, हैदराबाद
बड़ी दूर है,रांची
बड़ी दूर है,वो हर जगह
जहां महिलाओं के साथ दुष्कर्म होते।
जहां महिलाओं के साथ भेदभाव होते।
जो है शिकार पितृसत्तात्मक व्यवस्था की।
बड़ी दूर है।

पास है,मेरी बहन
पास है,मेरी दोस्त
पास है,मेरी मां
पास है,वो सारे व्यक्ति
जिसके मन मस्तिष्क में वासना का वास है।
जिनके अंदर लिंग-भेद का कीड़ा हे।
जो है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बड़े सताए हुए।
बड़े पास है।

समाज की हर एक बात,समाज में है,
समाज से दूर भी,समाज के पास भी।
तय हमें करना,हमें करना क्या है?,
किन्हें सुधारना है?किन्हें सीखाना है?किन्हें पढ़ाना है?
पढ़ाना, लिंग समानता की बातों को
बताना, पितृसत्ता व्यवस्था के नुक़सानों को
सीखाना, नारीवाद के बराबरी का सिद्धांत को
हमें सीखाना है।

बड़ी दूर होगी,मंजिल हमारी
पर पास,हमें लाना है।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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